Monday, November 19, 2012

क्या टाल सकते हो

क्या टाल सकते हो 

बला की लौ पर चढ़कर 
बला को टाल सकते हो,
मगर जो घाव बनेंगे, तुम 
उन्हें क्या टाल सकते हो।

जो आंसू बंद आँखों में 
निकलने की चाह रखते,
छुपा लो दामन में जितना 
उन्हें क्या टाल सकते हो।

गुजरता वक़्त भुला देगा 
के मंजर क्या हुआ होगा,
धुआं जो बंद दिल में है 
उसे क्या टाल सकते हो।

आईना मन बनाकर तुम 
खुदी को देख लो चाहे,
मगर लो लोग कहते हैं 
उसे क्या टाल सकते हो।
                                             - ख़ामोश 





आशा

आशा 

छलकती हुई 'आशा' 
उन मासूम आँखों से, 
बरशी हों आतुर 
कुछ छोटी चाहतों पर। 
के छलकी हो जैसे 
हरी 'ओंस' पत्तों से, 
जब हुआ नाच ले संग 
हवा का कोई सुर।
                                      - ख़ामोश 

वो संगीत जाने कहाँ है

  वो संगीत जाने कहाँ है 

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
पानी की बूंदों में 
कभी बारिश में 
कभी छलकते कसोरों में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
गाँव की गोरी की 
कभी चूड़ी में 
कभी पायल में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
भोले बैलों की 
कभी घंटी में 
कभी हल में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था में 
किसी फ़क़ीर की 
कभी वीणा में
कभी चिमटे में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
पानी के कुए की 
कभी रस्सी में
कभी बाल्टी में।

वो संगीत जाने कहा है 
जिसे ढूँढता था मैं
अपने पड़ोसिओं की 
कभी ख़ुशी मैं 
कभी प्रेम में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
अपने गाँव की
कभी ठंडी सुबह में
कभी गोधुली बेला में।
                                         - ख़ामोश 

कागज का टुकड़ा

कागज का टुकड़ा 

मैं वो कागज का टुकड़ा हूँ 
दुनिया से रहा हूँ बेख़बर,
हवा के झोकों का साथ निभा 
उड़ता रहा हूँ इधर-उधर।

मैंने भी सोचा था कभी 
देगा नाम मुझको भी कोई,
चाह मैं भी हिऊंगा किसी की 
और कागजों को तराह।

उमीदों को गले से लगा 
गीले आसमां के तले,
गुजरते लम्हों के संग-संग  
अब फट सा गया हूँ मैं।
                                               - ख़ामोश 

कांश मैं होता वो शीतल जल

कांश मैं होता वो शीतल जल 

उन हिमालय की चट्टानों के 
ऊँचे शिखर पर, 
पिंघलती बर्फ का ठण्डा पानी 
करता हुआ कल-कल, 
कांश मैं होता वो शीतल जल।

ले संग कुछ कंकड़ पत्थर 
बनके झरना कोई तत्पर, 
हरी दिशाओं को कहता कहानी 
वो छनता हुआ ठंडा पानी, 
करता हुआ कल-कल, 
कांश मैं होता वो शीतल जल।

वो बहती छोटी सी धारा 
नाहता है जिसमें जग सारा, 
कुछ छंद मिले कुछ फूल मिले 
और सबके मन का मैल लिए, 
वो बहता हुआ ठंडा पानी 
करता हुआ कल-कल, 
कंश मैं होता वो शीतल जल।
                                                   - ख़ामोश 

एक दीप जलाना है

एक दीप जलाना  है 

आशा के चिरागों से 
कहीं दूर मुझे चलकर,
पलकों के झरोकों में 
एक दीप जलाना है।

ख्वाबों में गया हूँ बहुत 
मन के डगर से चलकर,
दिल से हो जुड़ा कोई 
एक ख्वाब बनाना है।

आँखों से रोये हैं बहुत 
हलकी सी चुभन लेकर,
यादों में बसा कोई 
एक दर्द जगाना है।

अपनों को चाह बहुत  
जीवन के सफ़र में चलकर,
रूह से हो जुड़ा कोई 
एक प्यार बसना है।
                                     - ख़ामोश 


तन्हाईयां

तन्हाईयां 

आज हमें तन्हाईयां 
उदास करतीं है,
आज हमनें लकीरों में 
तेरा चेहरा बनाया है।

अपने जज्बातों में सिमटकर 
छलकने को हैं आंखें,
अपनी दर्द-ए-मोहब्बत में 
दिल तड़पाया  है।

क्यूँ न कहें वक़्त को सितमगर 
सितम किये हैं हजार,
थोड़ी सी ख़ुशी दी क्या 
ग़म बरसाया है।

होंठ सिमटें हैं मोहब्बत में 
आह भर-भर कर,
'ख़ामोश' क्या कह सकेगा 
सिर्फ तेरा नाम आया है।
                                            - ख़ामोश  

मेरे कांधे पे तेरा दर्द

 मेरे कांधे पे तेरा दर्द 

मेरे कांधे पे 
तेरा दर्द है,
मैं गिरा भी नहीं सकता 
उठा भी नहीं सकता।

दुनिया कहती है के
 प्यार ना करो,
मंदिर में दिया बनकर ग़र
खुद को जला नहीं सकता।

राह में बैठा है ख़ामोश   
इस कदर कब तक बैठेगा,
वापस ही आजा ग़र 
आगे जा नहीं सकता।

जलते सितारों को समझ 
देखो राख हो रहें हैं,
राशनी दे नहीं सकता ग़र 
तो बुझा भी नहीं सकता।
                                             - ख़ामोश 

कैसा कारवां है ये

कैसा कारवां है ये 

कैसा कारवां है ये 
और कहाँ तक जाएगा,
कितने मिलने हैं राह में 
और कितने छोड़ जाएगा।

अजनबी बन जाते हैं दिलबर 
और दिलबर बिछड़ जाते हैं,
न जाने कितने खूँ कोई 
दिल के करवाएगा।

कितने सपने बुने जाते 
और बिखर जाते हैं,
कब तक बटोरता कोई 
तिनकों को बनाएगा।

राह-ए-मंजिल कभी ऊँची 
तो कभी सिमट जाती है,
कब तक अपना आसमां कोई 
जमीं तक लाएगा।

कितने अश्क यूँ ही संभाले 
और बिखर जातें हैं,
कब तक माला बनाए कोई 
और पिरोये जाएगा।
                                            - ख़ामोश 

लो तुमको उपहार में दूं

लो तुमको उपहार में दूं 

मुझ पंकज की जीवन संज्ञा 
वो सूरज की पहली किरणें,  
उन किरणों को संचित करके 
लो तुमको उपहार में दूं।

मुझ जलज की कोमल पंखुरी 
उनमें छुपके ओंस के मोती,
उन मोती को संचित करके 
लो तुमको उपहार में दूं।

छिपे संख सीप और मोती 
मेरे समुन्दर के अन्दर भी,
अगर किनारा बन जाओ तो 
लो तुमको उपहार में दूं।
                                               - ख़ामोश 

नींद गयी सब

नींद गयी सब 

नींद गयी सब चैन गया सब 
तुम से बिछड़ कर रैन गया सब, 
सपनों की रंगी चादर पर 
कला रंग सा कोई फ़ैल गया अब।

वो वक़्त का उजला चंदा सा 
सुबह की रंगी किरणें सी, 
बस प्यार की छाया प्यार का दर्पण 
पलकों के पीछे रह गया अब।

वो महकी जुल्फें और खोई आंखें 
कैसे भूलूँ मैं वो लम्हें,
कुछ चंद टुकड़े कुछ चंद यादें 
होठों पे बसकर रह गया अब।
                                             - ख़ामोश 


Tuesday, November 13, 2012

नहीं ये और मत कहना

नहीं ये और मत कहना 

गर्दिश-ए-दौर आते हैं 
बिछड़ना दिल का होता है,
के मंजर तन्हा लम्हें हों 
नहीं ये और मत कहना।

हम हैं ख़ामोश लहरें सी 
के शायद ढूँढती साहिल,
के साहिल दूर हो जाए 
नहीं ये और मत कहना।

सुना एक फूल खिलता है 
इन पत्थर और दीवारों पर, 
के बहारें जा रही है अब
नहीं ये और मत कहना।

हमारी भी एक बसती है 
जहा से वो गुजरते हैं,
के राहों में निशां ढूंढे 
नहीं ये और मत कहना।

किताबों में पढ़ा हमने 
मोहब्बत है दीवानों की 
के पागल ये खड़ा देखो 
नहीं ये और मत कहना।
                                                 - ख़ामोश 

मुश्किल सा हो गया है

मुश्किल सा हो गया है 

तुम्हे सुनाए कैसे हाल-ए-दिल 
सुनाना मुश्किल सा हो गया है,
के कश्ती पानी में आ गयी क्या 
चलाना मुश्किल सा हो गया है।

हमारे होठों पर कपकपी सी 
ये दास्तां क्या सुना रही है,
के आह मंजर सा बन गयी क्या 
छुपाना मुश्किल सा हो गया है।

हमारे ख्वाबों में आना हर दिन 
तुम्हारी आदत सी हो गयी है,
के दिल मोहब्बत में आ गया क्या,
मनाना मुश्किल सा हो गया है।
                                                          - ख़ामोश 




एक गुलाब

एक गुलाब

एक गुलाब मैंने भी 
अपने सीने में छुपा रखा है,
मेरी यादों को, 
मेरे सपनों को 
जिसने महका रखा है।

पूनम की रात में 
मैं भी बैठा था,
 यूँ ही एक पत्थर पर, 
वो पत्थर अभी तक 
अपने बगीचे में दबा रखा है।
                                                    - ख़ामोश 


प्रायश्चित

प्रायश्चित 

दो अश्क बहे जब आँखों से 
हुआ प्रायश्चित कुंठित मन का,
धुल गए विषाद-पाप सब 
और हुआ दिल भी चंगा।

क्यों ने समझ पाया था अब तक 
हए ! खुद की जीवन वीणा,
कितने संगीत बना सकता था 
सुरमय करते ओरों का भी जीणा।

उलझा रहा उलझे हुए धागों में 
था भेद सिर्फ अपने तन का,
जब ज्ञात हुआ हूँ विजन मरुशथल 
टटोलता रहा संचित जीवन का।

अंतर्मन ने आवाज लगायी 
क्या है तेरा संचित जीवन का,
दोड़ता रहा इधर-उधर 
और भूल गया क्षितिज अपना।

दो अश्क बहे जब आँखों से 
हुआ प्रायश्चित कुंठित मन का।
                                                         - ख़ामोश 

अनंतकाल तक

अनंतकाल तक 

इसे पता है कि ये पागल 
मधुसरिता की धारा में,
अपनी मुग्धा से गलबाही कर 
अनंतकाल तक रहता चाहता हो।

नीड़ पड़ी है अब बरसों में 
उन्मादक परिमल में बसने की,
केशों के घने उस सावन में 
अनंतकाल तक रहना चाहता है।

मृदुल कपोलो और अधरों को 
सहज उंगलिओं  से सीकर,
चंचल मदिर आँखों मों डूबा 
अनंतकाल तक रहना चाहता है।
                                                      - ख़ामोश 

नीम के पत्तें


नीम के पत्तें 

नीम के पत्तों को 
समझकर आशियाना
उनमें छुपा जा रहा हूँ।

उनके सुलगाने से निकलते धुए को 
समझकर कर अपनी जिन्दगी 
उड़ाता जा रहा हूँ।

उनसे मिली जो कड़वाहट 
उसको सत्य समझ कर 
चखता जा रहा हूँ।

मगर मुझे ख़ुशी है 
के मैं असत्य से बहूत दूर 
चला जा रहा हूँ।
                                             - ख़ामोश 

बादलों के परे

बादलों के परे 

आँखों में कोई 
दर्द सा हुआ,
 ख्वाब कोई तो 
जला होगा।

पलकों में थमीं 
दो-एक बूँदें, 
यादों का बदल 
बरसा होगा।

तन्हा होकर कोई 
एक कोने में छुपा, 
कितना जुल्म उसने 
सहा होगा।

होठों पे दबी 
एक छोटी से हंसी, 
न जाने कितना गम 
छुपा होगा।

किससे हो शिकायत 
केसे हो शिकायत, 
कोई तो कहीं
अपना होगा।

ख़ामोशी में बैठा 
 आसमां तले, 
बादलों के परे 
कोई देखता होगा।
                                      - ख़ामोश 

मेरी कश्ती

मेरी कश्ती 

मेरी कश्ती कहीं मझधार में 
गोते लगाएगी, 
ना सोचा था मेरी जिन्दगी 
मुझको ही गवाएगी।

ख्वाबों की बारिश में 
हमने आंखें बंद कर ली,
पलकों से उतरकर वो 
मेरा सीना जलाएगी।

खुदा के घर पर 
मुझे उसने बुलाया था,
इबादत प्यार की पढ़कर 
मुझे मूरत बनाएगी।
                                                   - ख़ामोश 

कहाँ गयी मेरी वो सोंच

कहाँ गयी मेरी वो सोंच 

कहाँ गयी मेरी वो सोंच 
था जिसमे जीवन का जोश, 
अनंत समंदर की गेहराई 
और आसमां-सा जिसका छोर।

कभी प्रेम स्वरों में सिमटी 
कभी अश्रुमाला में बिंधी, 
कभी रश्मि की आभा में रंगी 
कभी मीठी बयार की संगी।

 कभी मधुर संगीत में बस्ती  
कभी मीठे दर्द को चखती, 
कभी आह पलकों में ढकती 
कभी पागल हो खुद पे हंसती।
                                                          - ख़ामोश 

तेरी मोहब्बत

तेरी मोहब्बत 

तेरे होठों की हंसी 
जिन्दगी की एक अमानत बन गयी है,
तेरा साथ नहीं है लेकिन 
मेरी रूह पर वो लिखावट बन गयी है।

कहाँ चला आया हूँ मैं 
मुझे मालूम नहीं,
लेकिन  तेरे लम्हों की चादर 
मेरी राहों की सजावट बन गयी है।

दिल तड़प उठता है 
तेरी जुदाई के गम से,
शुक्र है तेरी मोहब्बत 
मेरी धडकनों की बनावट बन गयी है।
                                                                     - ख़ामोश 



ना उम्मीद


ना उम्मीद 

ना उम्मीद हो तो पाने की कैसे सोंचे 
चोट जिनसे हो खाई उनके सिरहाने की कैसे  सोचे।

बैठे रहते हैं ख़ामोश बनकर इन चुप सी दीवारों से 
दीवारों से फिर बातों की कैसे सोचें।

                                                              - ख़ामोश 


तेरा मेरा हो

तेरा मेरा हो 


बेरंग बेवक्त को मैं तराशता रहा 
के कोई तो वक़्त ऐसा हो,
जिसमें कुछ रंग हों 
और तेरा मेरा हो।

सूखे पत्तो को खोंच भर कर हटाता रहा 
के कोई तो पत्ता ऐसा हो, 
जो हरा हो 
और तेरा मेरा हो।

सूखी कीकर के काटों को खुद से चुभाता रहा 
के कोई तो काँटा ऐसा हो, 
जो चुभे पर टूटे ना 
और तेरा मेरा हो।
                                                      - ख़ामोश 
          

अँधेरे में आईने में सूरत देखता हूँ

अँधेरे में आईने में सूरत देखता हूँ 

तड़पती आँखों का शबब 
 आशा के चिराग पर सेकता हूँ, 
और फिर उन आँखों को  
थोडा सा छलकाकर, 
अँधेरे में आईने में  
सूरत देखता हूँ।

कांपते होठों की आह पर 
ठंडी यादों का मल्ल्हम लेपता हूँ,
और फिर उन होठों को
 उंगलिओं से सीकर,
अँधेरे में आईने में 
सूरत देखता हूँ।

अपनी हर तन्हा रात को 
कागज के टुकड़ो पर लिखता हूँ,
और फिर उन अक्षर को 
धीमें से गुनगुनाकर,
अँधेरे में आईने में 
सूरत देखता हूँ।
                                            - ख़ामोश 


Monday, November 12, 2012

मीठा दर्द

मीठा दर्द 

संगदिल है मीठा दर्द 
जो न छुपे, न सामने आये 
बस तन्हा रातों में 
पलकों में छुपा 
अपने अफ़साने गाए।

कभी बदनाम ने हो 
और की निगाहों में 
कभी नाकाम न हो 
चुप-चुप सी आहों में 
होकर गुमनाम खुद ही 
तड़पते होठों पर मुस्कुराए।

संगदिल है मीठा दर्द 
जो न छुपे, न सामने आये।
                                                      - ख़ामोश 

कोई मौज मिली

कोई मौज मिली 

कोई मौज मिली कोई मस्ती मिली 
और दर्द की अहा भी खूब मिली,
रग-रग में बसे यूँ सतरंग से 
उन्माद सी उर में खूब मिली।

आँखों से छलकते अश्कों को 
रंगों की रहा में फेर दिया,
उषा की अदा में खिलते हुए 
फूलों की छठा में गेर दिया।

सपने जो तड़पते थे दिल में 
पलकों पर खुद ही धुल से गए,
और रंग मिले यूँ मस्ती के 
आँखों में समाकर घुल से गए।
                                                      - ख़ामोश 


मेरी ये जिन्दगी

मेरी ये जिन्दगी 

मेरी ये जिन्दगी तेरी अमानत हो गयी है, 
इसे ले जाओ आकर तुम कहीं ये खो गयी है।

कभी खामोशियों में तो कभी अनजान राहों में,
कभी गुमनाम शहरों में कभी चुपचाप आहों में,
बदलते मौसमों में ये सिमटकर सो गयी है।
मेरी ये जिन्दगी ........

तेरा अंचल पकड़कर के कभी लहरों में वो चलना,
हसीं सपनों के सागर में कभी अटखेलियाँ करना,
अकेली आज खुद ही ये मरुश्थल हो गयी है।
मेरी ये जिदगी .........

मेरे चंदा क्यूँ मुझसे दूर हो गहरी घटाओं में,
तड़पने हैं लगी सांसे नहीं है दम निगाहों में,
चिपककर के दीवारों से ये पागल हो गयी है।
मेरी ये जिन्दगी ..........
                                                                           - ख़ामोश 




फूल

फूल 

शायद सिमटी हुई थी
उस फूल की पत्तियां।

वक़्त के अंधेरों में 
सिमटी हुई सी
ऐसे लग रही थी 
के जैसे बिखरने को हों।

हल्की रोशनी बनकर 
मैं उसमें समां गया,
और सुबह की नमीं में 
मैंने उसे खोलने की कोशिश की।

वो खिल गयी 
और एक खिलता हुआ 
फूल बन गयी।
                                      - ख़ामोश 




क्यूँ अकेला हूँ

क्यूँ अकेला हूँ 

घनी खुशियों की शायें हैं 
मगर फिर भी अकेला हूँ,
निगाहें तन्हा तन्हा सी 
पुकारें क्यूँ अकेला हूँ।

टपकती आस्था मन से 
सुलगते दिल पर जब गिरती,
उठे धुआं जो हल्का सा 
पुकारे क्यूँ अकेला हूँ।

तरसते होंठ चुप-चुप से 
किसी को सोच जब खुलते,
निकलती आह हलकी सी 
पुकारे क्यूँ अकेला हूँ।

पुरानी यादों में जाकर 
सिमटती बाहें जब तन से,
बनी गर्मी सी हलकी सी  
पुकारे क्यूँ अकेला हूँ।
                                                - ख़ामोश 



खुशबू प्यार की तेरे

खुशबू प्यार की तेरे 

ये हवा बावरी 
मुझमें खोनें लगी, 
खुशबू प्यार की तेरे 
मुझमें होने लगी।

क्यूँ ये रंग लाल सा 
किरणों में अ रहा,
कुछ नयी सी उमंग 
दिल मेरा गा रहा, 
ये सुबह कुछ नयी 
फिर से होनें लगी। 
खुशबू प्यार की ...

तू नहीं साथ है
फिर भी तू पास है। 
क्यूँ तेरी याद में 
कुछ नया ख़ास है। 
रूह मेरी रंग में 
तेरे होने लगी। 
खुशबू प्यार की ...
                                             - ख़ामोश 



सिलसिला चलता रहा

सिलसिला चलता रहा 

कोरे कागज पर तेरा चेहरा 
बनाता रहा मिटाता रहा,
रात ढलती गयी 
और ये सिलसिला चलता रहा।

तेरी आंखें बनायीं 
तो कुछ खवाब सा बना,
तेरा चेहरा बनाया 
तो कुछ गुलाब सा बना,
और ये सिलसिला चलता रहा।

घनी बारिश सी 
कागज पर होने लगी, 
तेरी जुल्फें घटाओं सी 
जब बनने लगी,
और ये सिलसिला चलता रहा।

चाँद खिल सा गया 
और मेरा कमरा चमक सा गया,
तेरे माथे पर जब मैंने 
बिंदिया लगायी,
और ये सिलसिला चलता रहा।
                                                - ख़ामोश 



Friday, November 9, 2012

इजहार प्रेम का

इजहार प्रेम का 

इजहार प्रेम का कैसे करूँ 
मुझको ये आता ही नहीं,
हाँ प्रेम मगर इतना ज्यादा 
अब और सहा जाता ही नहीं।

तुम्हे देख सखी एक ही पल में
मैं  सुध्बुद्ध अपनी खो बैठा।
पर चाँद चकोरी से मिलने 
वो दिन क्यूँ आता ही नहीं।

तुम आँखों में जबसे हो बसी 
दिन चैन नहीं रत चैन नहीं,
इस कमल से मिलने को कमली 
क्यूँ वक़्त कभी अत ही नहीं।
                                                         - ख़ामोश 




वो महका गुलाब .....

वो महका गुलाब .....

वो महका गुलाब 
ख्यालों में आये,
ख़्वाबों में आए 
वो महका गुलाब .......
वो महका गुलाब .......

वो खुशबू उड़ी क्या 
मधहोश हो गए,
वो जुल्फों का तौबा 
झटक के गिराना।
वो महका गुलाब .......

वो बेहाल में दिल 
उनसे कहें क्या,
वो चुनरी में उनका 
चेहरा छुपाना।
वो महका गुलाब ........

वो चंचल हसीना 
इधर आ रही है,
वो चोखट पे उनकी
पलके बिछाना।
वो महका गुलाब .........
                                                     - ख़ामोश 


कमल

कमल 

इस कमल पर जब पड़ी 
सूरज की पहली किरण,
जग उठी खोई तरंग 
बन के शायद कोई उमंग।

बज उठा मुझमे संगीत 
हवा बनने लगी थी गीत,
इस कमल पर जब पड़ी 
सूरज की पहली किरण।

खिल गयी वो पंखुरी 
निर्जीव बनके थी पड़ी,
इस कमल पर जब पड़ी 
सूरज की पहली किरण।

यूँ ही तिमिर में बंद था 
लगने लगा कोई रंग सा,
इस कमल पर जब पड़ी 
सूरज की पहली किरण।
                                                    - ख़ामोश 

जब चाँद खिले

जब चाँद खिले 

जब चाँद खिले कहीं घटा में
और शावन की रुत बरसी जाए,
कोई कैसे खुद को रोक ले
आकर घटा में छिप जाए।

जब हलकी-हलकी ब्यार में
पागल खुशबू से मिल जाए,
कोई कैसे खुद कोई रोक ले 
आकार घटा में छिप जाए।

कुछ सिरहन से उठती हो मन में
जब हलके से कोई तन छू जाए,
कोई कैसे खुद को रोक ले 
आकर घटा में छिप जाए। 
                                                        - ख़ामोश 

प्रेम संज्ञा

प्रेम संज्ञा 

ज्ञान-रहित मानस-पटल में 
प्रेम ज्योति तुम बन कर आये,
घोर अँधेरे में अब तक था 
उजियारा तुम ही हो लाये।

शुन्य दिशा में लटक रहा था
विजन रहा में भटक रहा था,
बनकर क्षितिज मेरे जीवन का 
मेरे दिशागोचर कहलाये।

विवश था मेरा तिनका-तिनका 
संगीत था बेसुर मन का तन का,
राग रहित तन्हा जीवन में 
सृजन हाँ तुम ही हो लाए।

आशाओं के गहरे सागर में 
प्यासा बन कर डूब रहा था,
प्रेम-ज्ञान की संज्ञा तक तो 
प्रिया हाँ तुम ही हो लाये।
                                                       - ख़ामोश 

क्यूँ

क्यूँ 

क्यूँ आज तुम्हारी आँखों में 
एक नूर दीवाना चमक रहा है,
आशा की किरणे बिखरा कर 
एक प्रेम कहानी संवर रहा है।

विचलित मन में चंचल तिनके 
एक साज नया सा बना रहें हैं,
तिनका तिनका सिमट सिमट कर 
एक घर प्यारा सा बना रहे हैं।

इन कोमल अधरों पर मानों  
कोई राग दीवाना थिरक रहा है,
मुझको भी बतला दो ये क्यूँ 
मेरी धड़कन में सिमट रहा है।
                                                                     - ख़ामोश 

Thursday, November 8, 2012

मुझे याद आयेगा

मुझे याद आयेगा 

वो चहरे पे गहरी 
जुल्फों का शाया,
वो बनके घटा अब 
बरसने को आया, 
मुझे याद आयेगा।

वो पलकें झुकाना 
झुका के उठाना,
वो गुस्से में आँखों का
 हये नजराना,
मुझे याद आयेगा।

वो चेहरे में जन्नत 
गुलाबों की रंगत,
तुम्हे देखकर मैंने 
मांगी थी मन्नत,
मुझे याद आयेगा।
                                                 - ख़ामोश  

यूँ ही

यूँ ही 

वो चली जाती है, मगर 
फिर भी रह जाती है यहीं-कहीं, 
वो मेरा कुछ ले जाती है, मगर 
ले जाती कुछ नहीं।

शराबी आँखों में डूबा
झलक लूं ज़ाम की कोई, 
मेरी आँखों में वो अरमां 
यूँ बना जाती है कई।

कभी छलके न मदिरा 
हसीं होटों से कहीं,
ले उठा जाम के प्याले 
कदम बढ़ जाते हैं यूँ ही।

लाल रंग के गुलाबों से 
हसीं इन गाल पर क्यूँ री,
गिराने रेशमी जुल्फें 
हाथ उठ जाते हैं यूँ ही।
                                                       - ख़ामोश