Saturday, March 24, 2018

आओ तुम्हें देखूँ ज़रा

आओ तुम्हें देखू ज़रा
जैसे कभी सोचा नहीं
जैसे कभी जाना नहीं
आओ तुम्हें देखूँ ज़रा

तेरी भोली सी सूरत
और भोली भोली से बातें
मेरा चाँद आया पीछे
छोड़ अपनी रातें.......
आओ तुम्हें देखू ज़रा
जैसे कभी सोचा नहीं
जैसे कभी जाना नहीं

छोटे छोटे सपने लिए
बुनती मेरा छोटा आशियाँ
मेरा पंछी आया पीछे
छोड़ अपना आशमाँ.......
आओ तुम्हें देखू ज़रा
जैसे कभी सोचा नहीं
जैसे कभी जाना नहीं
                                    @ ख़ामोश


Saturday, February 13, 2016

तुम हो

तुम हो 

मेरे जीवन की अभिलाषाओं का दर्पण तुम हो,
मूक समर्पित मुझको मेरा अर्पण तुम हो । 

क्या माँगू कुछ शब्द नहीं मेरे ख्यालों में,
बन मदिरा तुम भर आई हो मेरे प्यालों में । 
अब और नहीं है अंश बचा जिसमें नहीं श्रण तुम हो,
मुझ पंकज की जीवन-संघ्या में हर कण तुम हो ॥ 

सावन की नित बारिश बन तुम मुझको भिगोती,
अनंत समंदर की गहराई बन तुम मुझको डुबोती । 
अब और नहीं है घट सूखा जिसमें नहीं श्रण तुम हो,
मुझ पंकज की प्रेम-प्रभा का हर अण तुम हो ॥ 

                                                                   - ख़ामोश 



Monday, October 5, 2015

क्या इसके बाद सवेरा है.....!!







शब्दों की हेरा फेरी में,

 एक अनजान पहेली में, 

उलझे धागों में बंधी सी,

 जीवन की नोका अंधी सी,

 क्यूँ बेकार का डेरा है, 

क्या इसके बाद सवेरा है,

 ये पूछे आभा अंधी सी, 

मेरे जीवन की संगी सी।

                                              -ख़ामोश

Friday, April 17, 2015

मेरी प्यारी नन्ही परि ……!!


तितलिओं  के पँखों को लगाये
मेरी प्यारी नन्ही परि ,
बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखती है
और नन्हे-नन्हे होटों से शायद मुझे बोलती है.....
मैं उड़ना चाहती हूँ पापा
दूर बादलों के बीच में,
और वहाँ एक रंगों का बिस्तरा बना
माँ की गोद में सोना चाहती हूँ.
मेरी नन्ही-नन्ही उंगलियाँ
इशारे तो नहीं कर सकती,
लेकिन दुनिया के सारे खिलौने
मैं अपनी मुट्ठी में पकड़ना चाहती हूँ.
मैं आपकी नन्ही परि
चारों तरफ रंग भरना चाहती हूँ.

                                                - अदिती के पापा 'ख़ामोश'

Monday, November 19, 2012

क्या टाल सकते हो

क्या टाल सकते हो 

बला की लौ पर चढ़कर 
बला को टाल सकते हो,
मगर जो घाव बनेंगे, तुम 
उन्हें क्या टाल सकते हो।

जो आंसू बंद आँखों में 
निकलने की चाह रखते,
छुपा लो दामन में जितना 
उन्हें क्या टाल सकते हो।

गुजरता वक़्त भुला देगा 
के मंजर क्या हुआ होगा,
धुआं जो बंद दिल में है 
उसे क्या टाल सकते हो।

आईना मन बनाकर तुम 
खुदी को देख लो चाहे,
मगर लो लोग कहते हैं 
उसे क्या टाल सकते हो।
                                             - ख़ामोश 





आशा

आशा 

छलकती हुई 'आशा' 
उन मासूम आँखों से, 
बरशी हों आतुर 
कुछ छोटी चाहतों पर। 
के छलकी हो जैसे 
हरी 'ओंस' पत्तों से, 
जब हुआ नाच ले संग 
हवा का कोई सुर।
                                      - ख़ामोश 

वो संगीत जाने कहाँ है

  वो संगीत जाने कहाँ है 

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
पानी की बूंदों में 
कभी बारिश में 
कभी छलकते कसोरों में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
गाँव की गोरी की 
कभी चूड़ी में 
कभी पायल में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
भोले बैलों की 
कभी घंटी में 
कभी हल में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था में 
किसी फ़क़ीर की 
कभी वीणा में
कभी चिमटे में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
पानी के कुए की 
कभी रस्सी में
कभी बाल्टी में।

वो संगीत जाने कहा है 
जिसे ढूँढता था मैं
अपने पड़ोसिओं की 
कभी ख़ुशी मैं 
कभी प्रेम में।

वो संगीत जाने कहाँ है 
जिसे ढूँढता था मैं 
अपने गाँव की
कभी ठंडी सुबह में
कभी गोधुली बेला में।
                                         - ख़ामोश